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यमुना बाढ़भूमि पर छठ घाट निर्माण से पर्यावरण संकट बढ़ा |

दिल्ली में छठ पूजा की तैयारियों के बीच पर्यावरण पर खतरे की घंटी बज गई है।
यमुना की बाढ़भूमि (Floodplain) पर छठ घाटों के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर बुलडोज़र और अर्थमूवर जैसी भारी मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पेड़ों की कटाई, ज़मीन की खुदाई, समतलीकरण और मिट्टी का भराव तेज़ी से जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कार्रवाई राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के 2015 के आदेशों का सीधा उल्लंघन है, जिसमें बाढ़भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण या परिवर्तन सख्त रूप से प्रतिबंधित है।


🌊 यमुना बाढ़भूमि पर जारी निर्माण कार्य

पुराने रेलवे पुल (Old Railway Bridge) के पास करीब 500 मीटर लंबी सड़क पत्थर और बजरी से बनाई जा रही है। वहीं, डीएनडी फ्लाईओवर के पास की साइट पर मिट्टी डालकर गड्ढों को भरा जा रहा है और विशाल टेंट लगाए जा रहे हैं।
आईटीओ के पास यमुना के पूर्वी किनारे पर एक प्लास्टिक रेत की बोरियों से बना अस्थायी पुल भी देखा गया है, जो दो हिस्सों को जोड़ता है।

इन जगहों पर कई छह फीट ऊँचे पेड़ उखाड़ दिए गए हैं, और प्राकृतिक वनस्पति — जैसे घास, झाड़ियाँ और दलदली पौधे — पूरी तरह हटा दिए गए हैं।

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⚖️ NGT के आदेशों की अवहेलना

2015 के NGT आदेश में साफ़ कहा गया था कि बाढ़भूमि को भरा या समतल नहीं किया जा सकता।
2016 में आयोजित “आर्ट ऑफ लिविंग” कार्यक्रम के बाद, NGT की उच्च स्तरीय समिति (HPC) ने रिपोर्ट दी थी कि इस तरह की गतिविधियाँ पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँचाती हैं। NGT ने इस रिपोर्ट को 2017 में स्वीकार कर आयोजकों पर ₹5 करोड़ का जुर्माना लगाया था।


🐦 पर्यावरणीय प्रभाव और विशेषज्ञों की चेतावनी

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा गतिविधियाँ बाढ़भूमि के जलाशयों (wetlands) के नष्ट होने का कारण बन सकती हैं।
प्राकृतिक वनस्पति — जिसमें रीड्स, पेड़ और जलपक्षियों का आवास शामिल है — पूरी तरह नष्ट हो चुकी है।
HPC की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि यदि बाढ़भूमि की स्थलाकृति (topography) बदली गई, तो उसकी जल धारण और पुनर्भरण क्षमता (water recharge capacity) हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।


🚫 ‘स्पष्ट उल्लंघन’ कह रहे हैं पर्यावरणविद

पर्यावरण कार्यकर्ता भावरीन कंधारी ने कहा,

“बाढ़भूमि को प्राकृतिक रूप में छोड़ना चाहिए। जो कुछ भी हो रहा है, वह कानून का उल्लंघन और पर्यावरण विनाश का कार्य है।”

NGT के 2017 के फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया था कि भले ही कोई जलभूमि (wetland) औपचारिक रूप से अधिसूचित न हो, यदि उसमें जलभूमि जैसी विशेषताएँ हैं तो उसे संरक्षण मिलना चाहिए।

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🙏 श्रद्धा बनाम पर्यावरण

घाटों पर काम कर रहे आयोजकों का कहना है कि उन्हें छठ पूजा के लिए बड़ी भीड़ की उम्मीद है, इसलिए स्थान को समतल और सुरक्षित बनाना ज़रूरी है।
हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि आस्था के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ लंबे समय में यमुना नदी और दिल्ली के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है।


🌱 निष्कर्ष

छठ पूजा आस्था और पवित्रता का प्रतीक है, लेकिन इसे प्रकृति के साथ सामंजस्य में मनाना ही सच्ची श्रद्धा है।
यमुना की बाढ़भूमि सिर्फ एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं और पक्षियों का घर है।
यदि हम इसे नष्ट करते रहे, तो अगली पीढ़ियाँ न छठ घाट देखेंगी, न यमुना की शुद्ध धारा।

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