क्या है ओज़(Oz)टेक्नोलॉजी?
आमतौर पर, हमारी आंखों में तीन तरह की शंकु कोशिकाएं होती हैं – L (लाल), M (हरा), और S (नीला)। जब हम कोई रंग देखते हैं, तो ये तीनों मिलकर मस्तिष्क को संकेत भेजती हैं और हमें वह रंग दिखाई देता है।
लेकिन Oz टेक्नोलॉजी इन कोशिकाओं को अलग-अलग टारगेट करके नए तरह के रंग सिग्नल मस्तिष्क तक भेज सकती है – जो हमारी प्राकृतिक दृष्टि की सीमाओं से बाहर हैं
💡 कैसे हुआ यह चमत्कार?
वैज्ञानिकों ने एक प्रोटोटाइप बनाया जिसमें हजारों M कोशिकाओं (Mid-wavelength cones) को विशेष लेज़र किरणों से सक्रिय किया गया।
इस प्रयोग में, बाकी L और S कोशिकाओं को बिल्कुल भी एक्टिव नहीं किया गया, जिससे मस्तिष्क को सिर्फ M कोशिका का रंग-संकेत मिला – और नतीजा?
एक बिल्कुल नया रंग, जिसे वैज्ञानिकों ने “Olo” नाम दिया है।
“Olo” कैसा दिखता है?
टेस्ट में भाग लेने वाले लोगों ने बताया कि “Olo” रंग एक नीला-हरा (Blue-Green) शेड है, जिसकी चमक (Saturation) इतनी तेज है कि उन्होंने ऐसा रंग पहले कभी नहीं देखा।
जब इस रंग को सामान्य रंगों से मैच करने की कोशिश की गई, तो विषयों ने इसे कम चमकदार (Desaturate) करना पड़ा ताकि इसे किसी सामान्य रंग से मिलाया जा सके।
इसका मतलब यह है कि Olo हमारे प्राकृतिक रंगों के दायरे से बाहर है।
रंगों की दुनिया में नया अध्याय
अब तक के सभी रंग जो हम देख सकते थे, वे हमारी आंखों की तीन cone cells की सीमाओं तक ही सीमित थे।
लेकिन Oz टेक्नोलॉजी ने साबित कर दिया कि अगर हम सिर्फ एक cone को ही टारगेट करें, तो ऐसे रंग उत्पन्न किए जा सकते हैं जो प्रकृति में कहीं नहीं हैं।
यह सिर्फ विज्ञान का अजूबा नहीं, बल्कि भविष्य में नई डिस्प्ले टेक्नोलॉजी, वर्चुअल रियलिटी, और कलर थेरेपी जैसी चीजों में क्रांति ला सकता है।
Also Read:

